Sunday, March 25, 2018

समदरिसि है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो

ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घण्टों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत ढूंढा। जुगत लगाई कि भजन खत्म होते ही पीछे के रास्ते से जाकर पकड़ लूंगा, लेकिन ग्रीन रूम के दरवाजे से निकलकर पता नहीं कब और कहाँ अदृश्य हो जाते थे। अक्सर यही हुआ। भजन गाकर निकलते ही या तो लोगों ने घेर लिया या अचानक से कहीं गायब हो जाते।
कई महीनों बाद एक दिन पता चला कि होशंगाबाद में रेलवे स्टेशन के आसपास घूमते नज़र आए हैं। सफ़ेद मैली धोती- कुर्ता पहने और गमछा डाले। निर्गुण पंडित कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र। अधपकी दाढ़ी। तानपुरा कहीं दूर रखा है, जो बेहोशी में भी उनकी नज़र के घेरे में है। कोई कहता बीमार हो गए हैं- किसी ने कहा लड़खड़ा रहे हैं। पैर पर नहीं खड़े हो पा रहे हैं। मन हुआ कि चले जाऊं, लेकिन हिम्मत नहीं हो सकी- यह तय था कि जब तक इंदौर से होशंगाबाद पहुचेंगे, वे अदृश्य हो चुके होंगे। मामला उस दिन वहीँ दफा कर दिया। अच्छा भी हुआ- नहीं गए, अगर जाते तो संगत तो दूर रियाज़ भी कानों में नहीं पड़ता। अगले दिन खबर में थे कि भोपाल वालों ने उन्हें उठा लिया है। भोपाल में ख़याल केंद्र खोलेंगे और वहीँ रखेंगे। यह भी सिर्फ एक ख़याल ही रह गया।
फिर किसी दिन पता चला कि नेमावर में है नर्मदा किनारे। किसी बाबा की कुटिया में धुनि रमा रहे हैं। वहीं डेरा जमाया है। रात के अँधेरे में गौशाला के बाजू में बैठेते हैं। वहीं अँधेरे में भांग घिसते- घोटते हैं और कभी- कभार मन होता है तो गा भी लेते हैं। घाट से सटी उस कुटिया से तानपुरे और आलाप की हल्की खरज नर्मदा किनारों से टकराती है। किनारों के साम- सूम अंधेरे और नदी का संवलाई उजारा पंडित जी के उस रियाज का अभी भी गवाह होगा। शायद उस समय उन्होंने कुछ देर के लिए ही सही, नर्मदा किनारे अपना गाम बसाया हो।
फिर एक दिन भनक लगी कि हमारे पिंड इंदौर में ही हैं। एक अखाड़े में रह रहे हैं। उस दिन भी खूब ढूंढ़ा। पता लगाया कि कौनसा अखाड़ा है। किस मोहल्ले में हैं, किस उस्ताद को अपना चेला बना रहे हैं। कुछ नाम सुनने में आए- कल्लन गुरु व्यायामशाला। सुदामा कुटी व्यायामशाला या बृजलाल उस्ताद व्यायामशाला। इनमे से वे कहीं नहीं थे। दो- तीन दिन बाद पुख्ता सबूत मिले कि बड़ा गणपति के आगे पंचकुईया आश्रम में हैं। यहीं दाल बाटी खा रहे हैं। हनुमानजी के मंदिर के सामने। पंचकुईया अपने घर से दूर नहीं था। करीब पांच- छह किलोमीटर की दूरी पर बस। गाड़ी उठाकर निकल गए। बगैर देर किए चप्पल पहनकर। शाम का धुंधलका छा गया था। इंदौर का धुआं और धूल आदमी को फ़क़ीर बना देती है। घर से चप्पल पहनकर निकल जाओ तो खैरात में मिलने वाली इंदौर की धुंध-धूल से आदमी खुद को आधा कबीर महसूस करने लगता है। शाम साढ़े सात बजे पंचकुईया पहुँचे तो आरती की ध्वनि थी। घी के फाहों में भींजे दीयों में आग महक रही थी। सफ़ेद और भगवा धोती में अध् भींजे पुजारी स्तुति गान में थे। संध्या आरती और हनुमान चालीसा के पाठ की करतल ध्वनियां। अपना मन नहीं था लेकिन स्तुति में। फिर भी आरती खत्म होने तक इंतज़ार करना पड़ा। बीच- बीच में यहां- वहां देखते रहे। ताली बजाते हुए इधर- उधर नज़र फेरते रहे। किसी कुटी में कहीं नज़र आ जाए शिवपुत्र। कहीं से रियाज की या किसी आलाप की आवाज आ जाए। लेकिन सूना ही नज़र आया आश्रम। आरती खत्म होते ही पूछा किसी से- जवाब मिला जानकी महाराज से पूछ लो, उनको पता होगा। जानकी महाराज को ढूंढा तो वो अपने गमछे धो रहे थे। गमछों से उनके पानी झारने और सुखाने तक उनका इंतज़ार किया। फटका मारकर अपने कमरे से बाहर आए तो उनसे पूछा- पंडितजी कहाँ बैठे हैं। उन्होंने बताया कलाकार आए तो थे, लेकिन दोपहर में चले गए। दिल बैठ गया। हमने तस्दीक करने के लिए फिर पूछा- आप जानते हैं ना मैं किनके बारे में पूछ रहा हूँ - जवाब था, हां ! महाराज, शिवपुत्र आए थे, लेकिन चले गए। एक गाड़ी आई थी बैठकर चले गए। दो दिन यहीं भांग खाई, भजन गाये और आटा भी गूंथा। मैं समझ गया कि पंडितजी चले गए यहाँ से भी। थोड़ी- थोड़ी बदरंगी और बेरुखी के साथ लौट आए।
यह पंडितजी की ठुमरी और उनकी ख्याल गायकी से दीगर उनकी कबीरियत की संगत और उसे जानने के करतब थे, जो कभी कामयाब नहीं हुए। मौसिकी से परे उनकी बेफिक्री से हर किसी का राब्ता रहा है। मेरा कुछ ज़्यादा ही। बीच में एक सुर का अदृश्य तार तो जुड़ा ही रहा हमेशा, लेकिन संगत अब तक नहीं हो पाई। रियाज और आलाप तो बहुत दूर है। इसी बीच मुम्बई से कुछ फिल्म मेकर भी आये थे- वो पंडितजी पर डॉक्युमेंट्री बनाना चाह रहे थे। इस बहाने भी हमने उनको खूब खोजा-पूछा। देवास टेकरी पर 'माताजी के रास्ते' पर भी पूछा-ताछा। उनकी खोज में मुंबई वालों की मदद करने का मन कम और अपनी मुराद पूरी करने का इरादा ज्यादा था- इसलिए नेमावर से लेकर दिल्ली तक फोन लगाए, भोपाल भी पूछा, लेकिन कुछ नहीं हो सका।
फिलहाल मैं नागपुर में हूँ- उनका सुना है कि वे पुणे में हैं, लेकिन हमें अपने प्रारब्ध पर यकीन कुछ कम ही है - इसलिए वहां पुणे भी नहीं जा रहे। क्या पता वहां से भी भांग दबाकर कहीं रफूचक्कर हो जाए पंडित जी।
- मुकुल शिवपुत्र हाल मुकाम कहीं नहीं।

Sunday, March 11, 2018

उम्र घिसे, चप्पल घिसे, घिसे न इमां

खून में कुछ गर्म रवानी हो तो यकीं आए हम हिंदुस्तान में ही हैं, उम्र घिसे, चप्पल घिसे, घिसे न इमां तो तुम हिंदुस्तानी हो।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां एक एटीट्यूड था। मैं उन्हें शहनाई वादक से भी पहले इसी एटीट्यूड के साये के तौर पर देखता हूँ। हद इस क़दर कि अपने हर दूसरे- तीसरे आलेख में उस्ताद का ज़िक्र बरबस ही साया हो जाता है। अपनी मौसिक़ी के बेइंतेहा ऊंचे दौर में उन्हें हज़ार दफ़े अमेरिका ने अपने यहां बसाने के जतन किए। अमेरिका की रॉक फेलर संस्था ने खां साहब से गुज़ारिश की थी कि वे उन्हें अपने देस में बसाने के लिए मरे जा रहे हैं। अगर वे अपना देस छोड़ अमेरिका आ जाएं तो वहां बनारस की तरह उनके मन माफ़िक माहौल अता फरमाएंगे। वहां उनके लिए आला दर्जे के साज़ ओ सामां होंगे। उनकी ज़रूरत की हर एक चीज़ एक ताली पर उनके सामने हाज़िर होंगी। लेकिन उस्ताद एक एटिट्यूड था। उन्होंने जवाब दिया कि  'अमेरिका में बनारस तो बसा दोगे, लेकिन वहां मेरी गंगा कैसे बहाओगे'। मैं देख सकता हूँ, घोर नाउम्मीदी के वक़्त में भी दो जलेबी और एक पैप्सी का शौक़ीन हिंदुस्तान का यह फ़नकार अपने एटीट्यूड के साथ अब भी जिंदा है, गर आपको नज़र नहीं आता तो यह दीगर मसला है।

इसी के इर्दगिर्द एक थी ललिता देवी, लालबहादुर शास्त्री की पत्नी। पीएनबी बैंक घोटाले के संदर्भ में एक ज़िक्र आया है उनका। आर्थिक, सामाजिक और नैतिक अराजकता के इस दौर में यह बानगी बिल्कुल मुफ़ीद नहीं है। इस मिसाल का कौड़ीभर मोल नहीं। फिर भी, ज़िक्रभर जो था तो कर रहा हूँ। अपने प्रधानमंत्री रहते हुए शास्त्री जी ने समय की बचत को ध्यान में रखते हुए फ़िएट कार खरीदने का मन बनाया था, लेकिन उस वक़्त उनके पास कुल जमा सात हज़ार ही थे और कार की कीमत बारह हज़ार। पांच हज़ार का कर्ज़ शास्त्री जी ने इसी बैंक से लिया था जिसकी दुर्गति नीरव मोदी कर गया। कार खरीदने के एक साल बाद ही शास्त्रीजी की मृत्यु हो गई। इंदिरा गांधी ने बैंक को कर्ज माफ़ी की पहल की, लेकिन शास्त्रीजी की पत्नी ललिता देवी ने इनकार कर दिया और सालों तक इस कर्ज को अपनी पेंशन से चुकता कर दिया। छोटे कद के शास्त्री जी अपने एटीट्यूड में बड़े थे, ऐसा सुना था, लेकिन पत्नी ललिता देवी ऐसे एटीट्यूड की माँ- बाप थीं।

इन किस्सों का यूँ मोल तो कुछ भी नहीं, की हम सबको अपने एकाउंट में 15 लाख की प्रतीक्षा जो है। बावजूद इसके इन किस्सों से गर मेरे और तुम्हारे ख़ून में कुछ गर्म रवानी महसूस हो तो यकीं आए की हम हिंदुस्तान में ही रहते हैं।

उम्र घिसे, चप्पल घिसे, घिसे न इमां तो तुम हिंदुस्तानी हो।

प्रिया प्रकाश

रोशन अब्दुल रऊफ फिलहाल प्रिया प्रकाश से ज्यादा सुखी है। क्योंकि वो नहीं है। वो देश के 70 एमएम के पर्दे पर होकर भी इन्विज़िबल है। प्रेम में होना हर बार इतना भी सुखकर नहीं होता, भले ही वो एक तरफा ही क्यूं न हो।

ज्यादातर जमात उसकी कारी आंखों में डूब गई है। देश उसकी आइब्रो के साथ ऊपर- नीचे हो रहा है। 26 क्षणों के वीडियो में उसने सिर्फ एक बार आंख मारी थी, लेकिन अब करीब 40 लाख बार से ज़्यादा वायरल हो चुकी प्रिया इतनी ही बार आंख मार चुकी हैं, करीब इतनी ही बार पिस्तौल चला चुकी हैं। 18 साल की यह लड़की 24 घण्टों में 25 बार साक्षात्कार दे चुकी हैं। नेशनल न्यूज़ चैनल लड़की से अब भी आंख मारने की गुजारिश कर रहे हैं। वो कभी पिस्तौल चलाती हैं, कभी गाना भी गाती हैं। इंस्टाग्राम पर 30 लाख फॉलोवर्स के साथ उसे वायरल गर्ल, नेशनल क्रश ऑफ इंडिया और वैलेंटाइन गर्ल के खिताब से नवाजा जा चुका है। यूँ कहें तो बेहतर, की ये समय अपने चरम पर है।

लड़की को अपनी फेम भारी पड़ रही है। - 'उससे जब पूछा जाता है की कैसा लग रहा है, तो वो कहती हैं, खुशी हो रही है, लेकिन उसकी आत्मा कह रही है क्षमा कर दो, गलती हो गई। पूरा मीडिया मिलकर इस बाला को करप्ट कर देगा। दरअसल, दुनिया तो एक ही है, फिर भी सबकी अलग- अलग है। प्रिया प्रकाश वारियर की अलग और रोशन अब्दुल रऊफ की दुनिया अलग।

प्रिया अपने ट्रोल में दुखी है, रोशन अब्दुल रऊफ अपने नहीं होने में ज़्यादा सुखी है।

-

आंख का रंग

वहां से दूर 
बहुत दूर
यहां इस तरफ 
तुम क्या जानो, याद क्या होती है

आंख का रंग कैसे याद करना पड़ता है
कितना खपना पड़ता है
काले और कत्थई के बीच

कितनी कोशिशों के बाद 
मुझे अब भी तुम्हारी आंखों का रंग याद नहीं 

आँखों की स्मृति में एक उम्र बीत सकती है

और वो वादा
जो आंखों में किया था
की हम कभी भी
कॉफ़ी नहीं पिएंगे अकेल- अकेले
और कोई सपना भी नहीं देखेंगे

ये फासलें न हो तो
आंखों के रंग पर दीवान लिखे जा सकते हैं

तेज़ हवा में गालों से रिसता हुआ तुम्हारा आई लाईनर
यहां एक मुद्दत की तरह है मेरे पास

एक गहरी बहती हुई लकीर
जो हर सुबह तुम अपनी आंखों के पास खिंचती हो
शाम तक खुद ब खुद अपने ही पानी में डूब जाती है।

मुझे याद है
तुम्हारे कमरे के रोशनदान के पास
कैसे इकट्ठा हो जाते हैं कबूतर
और हर सुबह तुम्हें जगा देते हैं

तुम रोज कबूतरों के ख़िलाफ़ शिकायतें करती थी
मैं तुम्हारी वो सारी शिकायतें सुनता रहा हूँ

बावजूद इसके की 
ज़्यादातर धूसर भूरे कबूतर मेरी कविताओं का बिंब हैं।

याद है तुम्हें
एक बार तुम्हारी कमर के ताबीज़ के धागे को बांधने में उंगलियां कितनी उलझ गईं थी मेरी,



Monday, March 5, 2018

विकल्प त्यागी की मृत्यु

बहुत उदास दिन था, अलसाया हुआ बगैर धूप का दिन। विकल्प त्यागी। पत्रकारिता में मेरा एक जूनियर। कुछ साल पहले जब मैं पीपल्स समाचार में काम करता था, विकल्प मेरा ब्लॉग 'औघट घाट' पढ़कर मुझसे मिलने आया था। उसके साथ मेरा एक दूसरा जूनियर मयंक शर्मा भी था। बोला आपका ब्लॉग पढ़ता हूँ। आप अच्छा लिखते हैं। मैं भी लिखता हूँ, और खूब पढ़ता हूँ। उस दिन उससे बहुत बातें हुईं। फिदेल कास्त्रो पसंद है बहुत। आजकल चे ग्वारा को पढ़ रहा हूँ। आप भी पढ़िए प्लीज़। उनकी 'मोटरसायकल डायरी'  ऑर्डर की है। वगैरह, वगैरह। उत्साह से भरा विकल्प खूब पढ़ना- लिखना चाहता था। बाद में शायद चे की 'मोटरसाइकिल डायरी' से प्रभावित होकर ही उसने अपना फेसबुक नाम 'जिप्सिज़ स्टोरी' रखा हो। इस मुलाकात के बाद वो हमेशा मुझे इनबॉक्स में पढ़ने लिखने और किताबों की बातें करता रहा। मुझे निर्मल वर्मा का भूत कहता था। और मैं इस तारीफ से भर जाता था।

आज शाम को मेरी एक पोस्ट पर प्रणय रघुवंशी (लखन) का कमेंट मिला। 'विकल्प नहीं रहा' यह संयोग ही था कि मृत्यु पर ही आज मैंने अपनी एक पोस्ट शेयर की थी। कुछ देर बाद प्रणय ने फ़ोन कर विकल्प के बारे में बताया। अच्छा लिखने और पढ़ने वाला एक लड़का नहीं रहा। जिप्सी का सफर थम गया।

मृत्यु एक चुप्पी है, एक ठंडी गहरी नींद। वहां कुछ नहीं है- कुछ भी नहीं। किसी की मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं बचता। न कोई कहानी, न कोई पेंटिंग और न ही कोई कविता। लेकिन लिखने वाले यहाँ भी शब्दों का सौंदर्य ढूंढ लेते हैं। ब्यूटी ऑफ टेक्स्ट। मौत में अटका लिखने का सुख। यह भी एक भोग है। मैं भी ऐसे लोगों में से हूँ जो अक्सर लिखने के लिए मृत्यु जैसे 'सब्जेक्ट' को चुन लेते हैं। - और ऐसा कर के मृत्यु शब्द को ही नष्ट कर देते हैं। इसे घटा देते हैं, कम कर देते हैं। क्योंकि मौत को कहीं से नापा नहीं जा सकता। इसकी लंबाई- चौड़ाई को तय करने का कोई सिरा नहीं। किसी भी तरह की गवाही मृत्यु के लिए उचित नहीं। न कोई शब्द, न ध्वनि। न सांत्वना, न दुःख, न विलाप। मृत्यु एक मृत तटस्थता चाहती है। मृतप्रायः भाव। या मृतप्रायः भावहीनता। जहां कोई हलचल नहीं। कोई प्रतिक्रिया नहीं। जैसे कोई शून्य, या फिर कोई शून्य भी नहीं।

जिंदगी के कई नोट्स होल्ड पर हैं

नेपाल में काठमांडू घाटी के पास बागमती नदी बहती है। हिंदुओं और बुद्धिष्ट के लिए यह पवित्र नदी है। खासतौर से हिंदुओं के लिए। कई हिन्दू यहाँ अपने अंतिम दिनों में अपनी देह त्यागने आते हैं। जातक को जब यह लगने लगता है कि अब उसका अंतिम समय निकट आ गया है तो वह घरवालों के साथ यहां मरने के लिए पहुंच जाता है। मान्यता है कि इस नदी किनारे प्राण पखेरु हुए तो मुक्ति को प्राप्त होंगे। नेपाल और भारत से कई लोग यहां पहुँचते हैं और मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं। दो, चार या आठ दिनों में जो मर गए सो मर गए। जो नहीं मर सके वे बेरंग लौट जाते हैं। मानो रेल का टिकट तो खरीद लिया, लेकिन स्टेशन से रेल छूट गई, तो घर वापस लौट आए। जो मृत्यु को प्राप्त नहीं हो पाते वो निराश घर लौट जाते हैं।

- क्या समृद्ध दर्शन है हिन्दू धर्म का, इस संस्कृति का। मृत्यु के इतने करीब आकर सिर्फ हिन्दू ही इतना रचनात्मक, इतना बेलौस हो सकता है। इतनी भयावह, ठंडी और रहस्य से भरी मृत्यु के प्रति इतना उदार हिन्दू के अलावा कोई है?

- सदियों से सवालों में घिरी मौत के रहस्य को सिर्फ हिंदू दर्शन ही मुक्ति शब्द का इस्तेमाल कर चुटकियों में हल कर सकता है। -उसे सिर्फ मुक्ति शब्द का उच्चारण मात्र करना है।

बागमती नदी को लेकर हिंदुओ की इस मान्यता के बारे में मैंने कई साल पहले डिस्कवरी के टैबू सीरीज में जाना था। इसी मान्यता को पृष्टभूमि में रखकर साल 2014 के अंतिम दिनों में देवास में मैंने एक नॉवेल लिखने की शुरुआत की थी। साल 2015  तक लिखने का प्रयास चलता रहा। देवास में ऑफिस के पास दो कमरों के किराए के घर में डेढ़- दो सौ पन्नों पर लिखाई भी हुई। टेकरी की दैवीय ऊर्जा और कुमार गंधर्व के निर्गुणी भजनों की वजह से बहुत हद तक मैं अपने नॉवेल की पृष्ठभूमि के आसपास ही था। फिर 2015 में नागपुर चला गया। नया चूल्हा, नई चौखट। नई सड़कें और एक नई खुश्बू ने मिज़ाज बदल दिया। इन सब के बावजूद आत्मा के एक कोने में इस नॉवेल के टेक्स्ट और इमेज दम भरते रहे। फिर 2016 में एक फ़िल्म आई मुक्ति भवन। अप्रैल 2017 में मुक्ति भवन रिलीज़ हुई। फ़िल्म का किरदार यहाँ वाराणसी घाट पर मरने चला आता है। उसकी अंतिम सांस की प्रतीक्षा के इर्द-गिर्द ही पूरी फिल्म की कहानी है। जिस दिन यह फ़िल्म देखी उसी दिन आत्मा में दबी नॉवेल की कहानी हमेशा के लिए दफ़न हो गई। दुनिया बहुत तेज़ चल रही है और हम बहुत सुस्त। अक्सर कुछ चीज़ें वक्त से पहले घट जाती हैं, कुछ इतनी देर से की वह बेवक़्त हो जाती हैं। दोनों ही तरह की स्थितियों में हमसे कुछ न कुछ छिन जाता है। कई दफ़ा कई मुआमलों में हमसे देर हो जाती है। अब लगता है हम पर मुनीर नियाज़ी की नज़्म ही मुफीद है।

 " हमेशा देर कर देता हूँ मैं, जरूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो, उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो, बदलते मौसमों की सेर में दिल को लगाना हो, उसे जाकर बताना हो, हमेशा देर कर देता हूँ मैं।"

देवास के उस अधूरे नॉवेल की मृत्यु के बाद नागपुर में  एक दूसरे नॉवेल की शुरुआत हुई है। धंतोली की उस ख़्वाबगाह से जहाँ मैं 26 महीने रहा। इक्यावन सीढ़ियों के बाद चौथी मंज़िल पर दो तरफ छतों वाले उस कमरे में। जहाँ मैंने सबसे ज़्यादा कविताएं लिखीं। मेरी अगस्त डायरी का एक बड़ा ब्लूप्रिंट वहीं लिखा गया।

- और अब साल के अंत में,

नागपुर से वापस इंदौर आने के छह महीनों बाद भी हालांकि इस नई नॉवेल के फूटनोट्स होल्ड पर हैं। लेखन पूरा जीवन माँगता है, जैसे जिंदगी भी पसरने के लिए बहुत जगह मांगती है।

Friday, July 7, 2017

ऑलमोस्ट डाइड,

कभी- कभी इस बेनूर सी जिंदगी में
चुपके से जीना पड़ता है
इतना धीमे की पता भी न चले की सांस का आरोह- अवरोह है भी या नहीं
हम अपनी ही देह को निस्तेज 
और निढाल पड़ा देखते हैं दूर कहीं सुमसाम में
हवा में
हम ऐसे रह गए यहाँ
जैसे छोड़ दी गई जगह कोई
न नगर, न खरपतवार कोई
मन बसता भी नहीं, उजड़ता भी नहीं
दिल्ली में चौंसठ खंभा से कुछ ही दूरी पर
हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया की दरगाह के पास
ग़ालिब की सूनी कब्र से हम
सूखे हुए गुलाब के फूल उड़ते हों बगैर खुशबू के जहाँ
पीपल के सूखे पत्तें गर्मियों के दिनों में सरसरा जाते हों दरगाह के फर्श पर जैसे
बारिशों में भीग-भीगकर स्याह काले हो जाते हों पत्थर जहाँ
कोई शायर भरी महफ़िल में
अपनी याददाश्त खो बैठे
शेर याद आए तो मिसरा भूल जाए
या फेज़ का कोई शेर हवा में अटक जाए ऐसे
की उसे वाह भी न मिले और आह भी न मिले
कभी- कभार हम खुद ही
अपनी कलाई पकड़ नस दबाकर देख लेते हैं
हम हैं की नही
किसी के पास कोई हकीमी हुनर हो तो आएं
और देखे
नब्ज़ टटोल लें
बताएं हम हैं की नहीं
तुम हो की नहीं
तुम, हां तुम ही।

- ऑलमोस्ट डाइड,

Sunday, July 2, 2017

जैसे नीला समंदर अपने भरे गले से गा रहा हो.


किसी ऊँची जगह पर चढ़ना और मेहदी हसन की ग़जल सुनना, कमोबेश दोनों का एक ही हासिल है, कम अज कम मेरे लिए तो। ऐसा सुख जिसे हम किसी ऊंचाई पर पहुँच कर भोगते हैं- जैसे पहाड़ पर चढ़ने का सुख।
जगजीत सिंह ज्यादातर गज़लों में दुःख गाते हैं। वे एक राग रुदन के साथ तुम्हे अंधेरे में तन्हां छोड़ देते हैं। अगर उनके गाये पंजाबी टप्पों को छोड़ दिया जाए तो, वे अपनी अधिकतर गज़लों में ताउम्र पीड़ा ही गुनगुनाते रहे।
इसके बरअक्स, मेहदी हसन इश्क़ गाते थे। राग इश्क। उनकी खरज हमें रूमानी हासिल के साथ एक क्लैसिक हाइट पर ले जाती है- एक रूमानी गहराई में। इश्क और मौसिकी दोनों में एक साथ सबसे ऊँची जगह होने का अंदाज़ देती हुई। प्रेम में होने और मौसिकी के सुर- ताल, स्वर लहरियां व इबारत समझने की मिक्स फीलिंग। कई बार उन्हें सुनने के दौरान हम कुछ भी दर्ज नहीं कर पाते। कोई टेक्स्ट नहीं, कोई कविता नहीं।
लता मंगेशकर ने एक बार कहीं कहा था- ' मेहदी हसन की आवाज़ ख़ुदा की आवाज है ' - ख़ुदा ने ख़ुदा की आवाज़ को ख़ुदा कहा। सुनिए, ख़ुदा की आवाज़ कैसी होगी।
करीब बाईस साल पहले एक टूरिस्ट बस में पहली बार मेहदी हसन की आवाज़ सुनी थी, पहली गज़ल थी- ' जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ' दूसरी थी - ' रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ ' एक ही सफर में प्रेम के दोनों छोर, दोनों किनारे समझ में आ गए- पहले प्रेम और फिर विरह। - और फिर अपना स्टेशन आ गया, जहाँ हम उतर गए।
इसके बाद इतने सालों में वक़्त- बेवक़्त मेहदी की सैकड़ों गज़लें सुनी। रिकॉर्डिंग्स, लाइव कंसर्ट रिकॉर्डिंग और पाकिस्तान की चलताऊ फिल्मों में गाये उनके गाने भी। सब सुना। इस बीच इंटरनेट कैफे पर कई - कई घण्टों डाउनलोडिंग का भी एक लंबा सिलसिला चला। इस पैशन से कई रेयर गज़लें भी इकट्ठा हो गईं। इनमें से बहुत तो याद हो गई, कुछ की सिर्फ धुनें याद है- सैकड़ों सुनना अभी बाकी है। - इतने सालों तक सुनते रहने के बाद अब
भी लगता है जैसे एक बड़ा सा नीला समंदर अपने भरे गले से गा रहा है, शे'र पढ़ रहा है। इतना इत्मीनान और ठहराव, एक पूरी अंधेर रात में सिर्फ एक सांस। पूरी रात जगराता और लगे कि सिर्फ एक आह ली हों। जैसे हम भी धीरे- धीरे जी रहे हों, मेहदी की आवाज के साथ- साथ। जैसे पहाड़, जंगल और समंदर जीते हैं अपनी ही जगहों पर खड़े- खड़े। पहाड़ कहीं नहीं जाता, वहीँ होता है अपनी जगह, फिर भी अपने जीवन में सबसे ऊंचा है, समंदर कहीं नहीं जाता, वह अपनी जगह ही अपने राग और अपने आलाप में बहता है। अरण्य किसी के पास चलकर नहीं जाता, वो हर कहीं नहीं उगता, फिर भी अपने खुद में गहन है- इंटेंस है। मेहदी हसन की आवाज भी वहीँ है, अपने ही होठों पर हलकी सी मुस्कुराती हुई, उन्हीं के अंदर, उस तह में, उनके गले की गहरी सुरंग में- और इस तरफ तुम्हारे मन की अतल गहराइयों में।
दरअसल, मेहदी हसन गाते नहीँ थे, सुनाते थे, जैसे पहाड़ गाते नहीं, फिर भी वे तुम्हे वो सब देते हैं, जो तुम्हे चाहिए -एक अदम्य ऊंचाई, बीते हुए पत्थर, कांटे और फूल भी। प्रेम और विरह का एक इंटेंस जंगल, एक अरण्य। ग़जल सुनने की एक क्लैसिक हाइट।

Sunday, June 18, 2017

जिसे आप देख रहे वो व्यापारी, जिसे मैं देख रहा वो अन्नदाता

- खेतों में बीज बो कर धान उगाने वाला अन्नदाता अन्न की बर्बाद नहीं कर सकता. वो अन्न का एक दाना भी अपने पैरों के नीचे नहीं आने देता है. किसानों की आड़ में एक अदृश्य अराजक अपने काम को अंजाम दे रहा है. - और अगर मैं गलत हूं- वो किसान ही है जो सड़कों पर अन्न बर्बाद कर रहा है, तो फिर वो निश्चित रू प से अराजक हो चुका है, जो पहले कभी नहीं रहा.
- और यह लालबहादूर शास्त्री का किसान तो बिल्कुल भी नहीं है.
मैंने अपने आसपास ऐसे किसान देखे हैं, जो अपने खेत, खलिहान और घर के आसपास बिखरे अनाज के दानों को बिन-बिनकर ढेर सारा अनाज इकठ्ठा कर लेते हैं. जिस जगह आपको एक दाना नजर नहीं आएगा, वहां से बैठे-बैठे वे कई किलो धान इकठ्ठा कर लेते हैं. इस प्रैक्टिस से उनकी कमर झुक जाती है, ज्यादातर किसान अपने बुढ़ापे में झुककर ही चलते नजर आते हैं. अन्न की इस कदर कद्र करने वाला कोई किसान तो क्या, कोई अन्य आदमी भी
अन्न के प्रति इतना रोष नहीं रखेगा.
पानी के टोटे और बिजली की कटौती में रात-रातभर जागकर हल जोतने वाला किसान अपना धान और दूध सड़कों पर नहीं उड़ेलता. वो जानवरों को नहीं मारता, पक्षियों को गोली नहीं मारता. अपने खेतों की फसल को पक्षियों से बचाने के लिए भी वो आदमीनुमा एफिजी का इस्तेमाल करता है. कभी किसी ट्रेन से गुजरते हुए तुमने देखा होगा जीजस क्राइस्ट पक्षियों को डराते हुए खेतों में खड़ा रहता है.
किसान और किसानों की स्थिति को समझने के लिए एक पूरा वर्ग जिस दयाभाव का इस्तेमाल कर रहा है, किसान वैसा नहीं है. वो अपने खेतों को खून से सींचकर अनाज उगाता है. अपना पेट खुद पालता है. इसके विरुद्ध आप और हम उसके धान पर पल रहे हैं. आपकी तरह उसका जीवन चाकरी पर नहीं, वह अपने अरण्य का मालिक है. इसलिए उसे आपके दयाभाव की कतई जरुरज नहीं है.
जो लोग शहरों में रहते हैं, या गांवों से जिनका वास्ता नहीं है, वे किसानों को इस आंदोलन के जरिये उसी दयादृष्टि और हीनभाव से देख रहे हैं. दरअसल, वे जानते ही नहीं कि किसान होता क्या है, यह किस शै का नाम है. सुनिए! ... इस आंदोलन में वो किसान शामिल नहीं है, जो महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में आत्महत्या कर रहा है. साहूकारों से साल पर जमीन उधार लेकर अपना पेट पालने के लिए उसमें हल चलाने वाला किसान इसमें शामिल नहीं है. जिसके पास आधा बीघा जमीन भी नहीं, ऐसा बे- जमीन किसान इसमें शामिल नहीं है. ऐसे किसान की तो सरकार से 50 हजार रुपए तक कर्ज लेने की औकात नहीं है, वो तो ताउम्र अपने नफे-नुकसान पर ही जीता और मरता है. विरासत में अपनी औलादों को गरीबी सौंप जाता है। फिर भी वो बसें नहीं जलाता, आग नहीं लगाता, मुँह पर कपडा बांधकर पत्थर नहीं फेंकता।
- तो फिर कौन सा किसान इसमें शामिल है. जिसे आप किसान कह रहे हो और मान रहे हो. दरअसल, वह बड़ी दूध डेयरियों का मालिक है. वे सब्जी मंडियों के ठेकेदार हैं. उन्नत खेती के जरिये जो कई हैक्टेयर्स में सब्जियां उगाता है. जिनके पास हैक्टेयर्स में जमीनें हैं, जो अनाज मंडियों के नेता है, पदाधिकारी है. ये साहूकार है, जो धुप में सूख चुकी चमड़ी, पतली टांगों और और पिचके हुए पेट वाले किसानों को अपनी जमीन अदीने पर देते हैं. किसान और मजदूर के बीच का जीवन जीने वाला गरीब आदमी जिनकी जमीनों पर गैहूं, चना और सोयाबीन उगाता है. यह वह व्यापारी है, जिसने ‘अन्नदाता’ शब्द भी भारत के असल किसान से छीन लिया. अब अन्नदाता उसको कहा जाता है, जो गांवों में गरीबों को ब्याज पर बीज देकर उसका खून चूसता है, बीज देने से पहले ही वो धूप में सिकी चमड़ी उतार लेता है। इन सब के बाद भी वो गरीब खेत में बेल की तरह नजर आता है.
आप उसे किसान समझ रहे हैं, जिसने सरकार से कर्ज लेकर चार- चार ट्रैक्टर अपने घर के सामने खड़े कर लिए. नेशनल हाइवेज के पास से गुजरने वाली जमीन जिसने सरकार को करोड़ों रुपए में बेची है, जिसकी कीमत हाइवे बनने- गुजरने से पहले हजारों भी नहीं थी. जिनको सरकारी उपक्रम लगाने के लिए अपनी जमीन के बदले सरकार से करोड़ों रुपए मुआवजा मिल गया है. जिन्होंने जमीनें बेचकर अब मोटरसाइकिल के शोरूम गांवों में खोल लिए हैं. इनके लौंडे जब चाहे मॉल में तफरी करते हैं। यह व्यापारी, साहूकार जो अब भी इस अदृश्य किसानों के नाम पर सरकार से लिए हुए कर्ज की माफी चाहते हैं. दूध के भाव 50 रुपए लीटर करना चाहते हैं, बगैर ब्याज का कर्ज चाहते हैं.
आपका दयादृष्टि वाला भाव अच्छा है, इसे आप अपने पास रखिये, लेकिन जिसे आप इस दृष्टि से देख रहे हैं, ये वो नहीं है. किसान तो दूर कहीं अपने सूखे खेतों में खड़ा आसमान की ओर ताक रहा है बारिशों के लिए ... जिसे आप देख रहे वह व्यापारी है, जिसे मैं देख रहा हूं वह अन्नदाता है, जो अब कहीं नहीं है. किसी की दृष्टि में नहीं. वह अदृश्य है मुख्यधारा के भूगोल से।

Tuesday, June 6, 2017

मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा

मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा, 
वे नय्यों चालदां, वे नय्यों देंदा है हुंगारे

अकेलेपन की कोई जगह नहीं होती. वह एक एब्स्ट्रैक्ट अवस्था है. एक उदास अंधेरे का विस्तार. कभी न खत्म होने वाली अंधेर गली. इन अंधेर गलियों को हर आदमी कभी न कभी अपने जीते जी भोगता है. जो भोगता है उसके अलावा शेष सभी के लिए ऐसी गलियां सिर्फ एक गल्प भर होती हैं. एक फिक्शन सिर्फ.

मेरा अकेलापन, तुम्हारा गल्प.

हमारे लिए जो गल्प है, उसी रिसते हुए दुख को जगजीतसिंह ने अपनी आवाज में उतारा. 90 के दशक के बाद जगजीतसिंह ताउम्र अपने बेटे का एलेजी (शोक गीत) ही गाते रहे. उनकी पत्नी चित्रासिंह ने तो इसके बाद गाना ही छोड़ दिया. दरअसल, 1990 में किसी सड़क हादसे में जगजीत-चित्रा के इकलौते बेटे विवेक की मौत हो गई थी. इसके बाद दोनों का साथ में सिर्फ एक ही एल्बम रिलीज हुआ. समवन समव्हेअर. ऐसा कहते हैं कि जगजीतसिंह कई बार घर में ही इस गीत को गुनगुनाया करते थे- और फिर अचानक से चुप हो जाया करते थे. कई बार तुम अपना दुख दूर नहीं करना चाहोगे.
इसके बाद जगजीत-चित्रा जिंदगीभर अपने सूने मकान में, अपने खालीपन में अकेले रहे. वे मिट्टी का पुतला बनाकर दिल बहलाते रहे. हम सब की तरह. हम सब भी अपने दुखों के पीछे एक मिट्टी का पुतला बनाकर रखते हैं/ दिल बहलाने की कोशिश करते रहते हैं. एक ऐसा पुतला जो न बोलता है और न ही चलता. न ही
हुंकारा देता है. / - और फिर किसी दिन पूरी दुनिया तुम्हारे लिए एक पुतलेभर में बदलकर रह जाती है. तुम अपने सूनेपन में और ज्यादा एकाकी हो जाते हो और जिंदगीभर अपने आसपास मिट्टी के पुतले बनाते रहते हो. - कि तुम्हारा दिल लगा रहे.
2003 में मुंबई में जगजीतसिंह के एक लाइव कंसर्ट में उन्हें पहली बार सुना था. उन्होंने गाया था मिट्टी दा बावा नय्यो बोलदा... वे नय्यो चालदा ... वे नय्यो देंदा है हुंकारा. यह गीत चित्रासिंह ने किसी पंजाबी फिल्म में गाया था. इसके बाद शायद यह गीत दोनों के लिए एलेजी बनकर रह गया. अपने बेटे का शोकगीत. एक हरियाणवी लोकगीत की पंक्ति याद आ रही है. ‘ किस तरयां दिल लागे तेरा, सतरा चौ परकास नहीं ’ (कहीं भी रौशनी नहीं है, चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा पसरा है. मैं तेरे लिए ऐसा क्या करुं कि इस दुनिया में तेरा दिल लगा रहे)
जिस गीत को चित्रासिंह ने पंजाबी फिल्म में गाया, उसे बाद में जगजीतसिंह ने अपने कई कंसर्ट में गाया. - जैसे रुंधे गले से वे अरज लगा रहे हो कि मिट्टी का बावा बोलने लगे, चलने लगे.
हम सब का एक शोकगीत होता है. जिसका नहीं है, वे इस गीत को सुनकर रो सकते हैं/ दहाड़ मार सकते हैं. यह सुनकर हम एतबार कर सकते हैं कि दुख सिर्फ आंखों से ही नहीं रिसता. तुम्हारी त्वचा की रोमछिद्र से भी बहुत... दरअसल, बहुत सारा दुख छलक सकता है.
‘ मिट्टी दा बावा मैं बनानी हा
वे झाका पांडी हा
वे उठी देंडी हा खेसे
ना रो मिट्टी देया बाबेया
वे तेरा पियो परदेसी
मिट्टी दा बावा नय्यो बोलंदा
वे नय्यों चालदां
वे नय्यों देंदा है हुंगारे
ना रो मिट्टी देया बाबेया
वे तेरा पियो बंजारा
कित्थे ता लावा कलियां
वे पत्ता वालियां
वे मेरा पतला माही
कित्थे ता लावा शहतूत
वे मेनू समझ न आवे ’

Tuesday, May 30, 2017

- गायें जो तुम्हारे जीवन में हैं,

- गायें जो तुम्हारे जीवन में हैं,
बचपन में माँ उपले बनाती थी। गाय के गोबर के कंडे। फिर घर की दीवारों और ओटले पर उन्हें थेफती थी। घर की कई दीवारें उपलों से भर जाती। जब उपले सूख जाते तो उनका इस्तेमाल घर का चूल्हा जलाने के लिए होता था। उपले थेपते माँ के हाथ उसकी चूड़ियों तक गोबर से सन जाते, फिर वो जब अपने बाल को पीछे धकेलती तो उसके मुंह पर उसके गाल पर भी गोबर लग जाता। बचपन में वो भी गाय के गोबर के साथ खेलता, मिट्टी और गोबर के साथ खेलता हुआ ही बड़ा हुआ। कभी- कभी थोड़ा गीला गोबर उठा लेता और वो भी माँ की तरह उपले थेपता। उसके दोस्त भी इस शग़ल में साथ हो जाते, गोबर से खेलते। फिर दांव लगता। शर्त लगती। किसका उपला सबसे ज्यादा गोल। किसका उपला चाँद जैसा। तेरे उपले की नाक छोटी है। रात को रसोईघर में चूल्हे के सामने हम उसी उपले की सुर्ख़ आंच को देखते। हम अपने जीवन की लौ को ताकते। उसी गर्माहट से आत्मा पिघल जाती। ठंड के दिनों में तो गोबर के अंगारों और चूल्हे की तपन के बीच पूरी देह में आत्मा उग आती और हम उसे पूरे शरीर से झरता हुआ देखते रहते। हम अपने पिता के साथ भविष्य की उन सारी बुरी आशंकाओं को उसी चूल्हे की आग में जलाकर दफ़्न कर देते। सूखे उपलों को अंगारों में तब्दील होने के बाद हम उन पर रोटियों के गुब्बारे उड़ते देखते। काले और कत्थई धब्बों वाले सफ़ेद और गेंहुआ गुब्बारे। हम गोलाइयाँ देखते। माँ के हाथ से बेली गई गोल रोटियां और उपलों की गोलाइयों का अंतर नापते। दोनों के बीच कोई संबंध नहीं- जमीन में उगा गेहूं और गाय का गोबर। फिर ये क्या रिश्ता है। कौनसी संस्कृति का हिस्सा है- जानवर के पेट से निकलने वाले गोबर और मनुष्य के पेट के अंदर जाने वाले अन्न के बीच कौनसा संबंध है। ये किस संस्कृति का हिस्सा रहा है। ये कौनसी परम्परा है। जिसकी आंच में हम सदियों से अपनी देह को तपाते और आत्मा को सींचते आ रहे हैं। चूल्हे की आंच में पिघलते उपले की आग में क्यों हमारे चहरे का खून हमेशा दमकता रहता। जले हुए कंडों की राख भी सुबह हम अपने माथे पर घिस लेते हैं। हथेली पर रखकर हम भभूति की फक्की मार लेते। ये संस्कृति राख हो जाने तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती।
गौ के गोबर से हमारा- तुम्हारा रिश्ता खत्म क्यों नहीं होता - सोलह श्राद्ध में हमारे- तुम्हारे घर की कुंवारी बेटियां हर शाम को दीवारों पर संजा बनाती है, सोलह दिनों तक संजा गीत गाती। शाम होते ही गोबर के चाँद- तारे घरों की दीवारों पर दमकते लगते। ये चाँद- सितारे हमारे लिए आसमान के चाँद- तारों से भी सुंदर होते। श्राद्ध के इन्हीं दिनों में, सुबह हम देखते हैं कि हमारे पुरखों की आत्मा गाय के इसी गोबर की आंच और लौ में तृप्त हो रही है। गुड़ और घी का धूप हमारे पूरे जीवन- नगर को महका रहा। सींच रहा है। पोस रहा है। हम देखते हैं - धूप की गंध हर सीमा को पार कर के यहाँ- वहां पसर रही है।
इस संस्कृति का राजनीति से कोई वास्ता नहीं है, हमे अब भी राजनीति समझ नहीं आती। सनद रहे हम अब भी राजनीति की बात नहीं कर रहे हैं। बात मानवता की है। बात देस की ख़ुश्बू की है- जो तुम्हारे और हमारे मन और आँगन में रची बसी है। इस ख़ुश्बू के लिए तुमने कभी कोई पौधा नहीं उगाया। देस की ख़ुश्बू को महसूसने के लिए तुमने कभी कोई फूल नहीं खिलाया। मिट्टी किसी वृक्ष का पौधा नहीं। वो कोई फूल नहीं। फिर भी महकती तो है। इसकी महक हमारे- तुम्हारे इर्दगिर्द है। तुम्हारे आँगन में और दीवारें अब भी तुम्हे इसका अहसास तो दिलाते होंगे। चूड़ियों तक गोबर से सने अपनी माँ के हाथ तुम्हे याद तो होंगे, याद तो आते ही होंगे।
"जो भी भारत को अपना देश मानता है, उसे गाय को अपनी माँ मानना चाहिए" पता नहीं क्यों झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास का यह स्टेटमेंट मुझे बार- बार आकर्षित करता है, इस वाक्य के टेक्स्ट के भीतर का चार्म मुझे अपनी ओर खींचता है। बिटवीन द लाइन इसका एसेंस मुझे समझ आ रहा है। इसमें एक ख़ुश्बू महकती है। हो सकता है राजनीति से प्रेरित होकर उन्होंने यह कह दिया हो। या शायद गलती से- लेकिन हम और तुम गोबर के अंगारों और उसकी आंच को अलग नहीं कर सकते- अलग देख भी नहीं सकते। तुम अपने स्वयं के विचार को खुद से अलग नहीं कर सकते। रोटी और उपलों के बीच कोई संबंध नहीं। लेकिन इन दोनों से तुम्हारा तो कोई रिश्ता कभी रहा होगा। अपनी माँ के कहने पर तुमने कभी तो गाय को पहली रोटी खिलाई होगी। ... तो गाय इसलिए तुम्हारी माँ नहीं हो गई कि तुम उसे पवित्र मानते हो। वो माँ है ही नहीं। वो माँ हो भी नहीं सकती क्योंकि उसके लिए तुम्हे बेटा होना पड़ेगा और तुम तो अपने खून की माँ के भी अब बेटे नहीं रहे। --- क्योंकि - तुम गाय काटकर खाते हो। गाय सिर्फ एक पशु है। कभी तुमने उसे रोटी खिलाई हो इसलिए वो माँ नहीं बन जाती। ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते को रोटी देने पर वो तुम्हारा बाप नहीं हो जाता। तुम गाय को माँ मान ही नहीं सकते। गाय उनकी भी माँ नहीं जो उसे काटते हैं और उनकी भी नहीं जो उसकी रक्षा कर रहे हैं। तुम और हम, हम सब जो बचपन में उपलों से खेला करते थे किसी भी गाय की कोख से नहीं जन्मे, इसलिए उसका खून तुम्हारे अंदर नहीं है। लेकिन उसका दूध तो जरूर तुम्हारी रगों में दौड़ रहा होगा। अपने घरों को पवित्र करने के लिए तुम अब भी उसका मूत्र घरों में छिड़कते होंगे। गायों की तलाश में चौराहों पर जाते होंगे। इसी के कंडों की आंच से उठने वाले धुंए में पुरखों की अतृप्त आत्माएं घुलमिल जाती होगी। खून न सही उसका गोबर तुम्हारा है। - और उसका दूध भी। जाने और अनजाने।
तुम जानवरों को, पशुओं को भी मनुष्य से ... अपने से, खुद से अलग नहीं कर सकते ... चाहकर भी और अनजाने में भी। ... तो यह रिश्ता ही बरकरार रहने दो, मनुष्य और गोबर का रिश्ता। चाहकर या अनजाने में। अपनी गाय से ... अपनी माँ से या अपने पशु और अपने जानवर से। मेरा रिश्ता हो सकता है, गाय से न हो लेकिन उसके गोबर से है, यह मैं जानता हूँ। गाय तुम्हारी माँ नहीं, जानवर है, लेकिन उसके दूध से, इस जानवर के गोबर और मूत्र से तो तुम्हारा कोई रिश्ता होगा। ये संस्कृति। गोबर की संस्कृति राख हो जाने तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती। हमारे भी राख हो जाने तक पीछा नहीं छोड़ती ... नहीं छोड़ेगी।

Saturday, May 13, 2017

जस्टिन ड्रयु बीबर और हम सब

शास्त्रीय संगीत की महफिलों को सजाने के लिए जर्जर और लगभग ढह चुके सभागारों के लिए भी मिन्नतें करना पड़ती हैं। नेताओं के हाथ- पांव जोड़कर उन्हें अतिथि बनाया जाता है। जैक लगाकर टैंट हाउस वालों से दरी और लाल कुर्सियां जुगाड़ना पड़ती हैं। टिकट तो दूर प्रवेश पत्र भी इन महफिलों को नसीब नहीं होता। इतनी कुश्ती के बाद कुछ चार- छह सुनकार महफिलों में  मक्खियां मारते हैं। ऊंघते हैं। दरी से कचरा बिनते हैं। कुछ दरख़्त ऐसे होते हैं जो ठुमरी पर हाथ नचाते हैं। राग पर बैराग हो जाते हैं। इन पके दरख़्तों में से कुछ को तो को चाय बिस्किट भी नहीं मिलते। ग्वालियर घराना से लेकर किराना घराना तक। आगरा घराना से लेकर इंदौर घराना तक। जयपुर अतरौली से लेकर रामपुर सहसवान तक। कोई ठुमरी नहीं सुनता। कजरी- चैती तो दूर कोई ख़याल नहीं दोहराता। किसका विवाह। कौन छन्नू लाल मिश्र। किशोरी अमोनकर मरी तो पहचानी गई। यहाँ मुकुल शिवपुत्र बेख़याल है। राशिद खान गुमनाम हैं। कौशिकी चक्रवर्ती बम्बई तरफ निकल रही हैं। पुरनसिंह कोटी के बेटे मास्टर सलीम दिल्ली के जगरातों में हैं। कबीर के झांझ मंजीरें सिर्फ गाँवों की आवाजें हैं। निर्गुणी मालवा के बाहर नहीं जा पा रहे। भैरवी तो इतना भी रेअर नहीं। ध्रुपद तो दूर है - और गंभीर है।

जस्ट इन - जस्ट आउट
उधर सुना है- एक 23 साल का लौंडा जस्टिन बीबर बम्बई को ठग गया। जस्ट इन एंड जस्ट आउट। बॉस्केट बॉल शॉर्ट्स पहनकर आर एंड बी रहा था। (आर एंड बी एक सिंगिंग स्टाइल है - यह फंक, सोल, पॉप, हिपहॉप और रिदम ब्लूज़ का कॉम्बिनेशन होता है ) इसी जॉनर के लिए जस्टिन बीबर जाना जाता है।  भारत के 60 परसेंट बिलो 21 कूल डूड बीबर के दीवाने हैं - लेकिन वो शॉर्ट्स पहनकर लिप्सिंग कर गया। कूल डूड की तो बात ठीक है - यह उनका लाइफस्टाइल है। इस उम्र की उनकी अपनी चॉइस है। लेकिन उन इंटेलेक्टुअल्स का क्या जिन्होंने 50 हज़ार / 75  हज़ार का टिकट लिया था। उस बॉलीवुड का क्या जो बाहें पसारकर उसके साथ सेल्फी लेना चाहता था।    

- तुम्हारा ही गाना गाना चाहता हूँ बीबर - ' व्हाट डू यू मीन ' जस्टिन ?  नाउ से ' सॉरी ' टू इंडिया। कूल डूड तुम भी जस्टिन को सॉरी कह सकते हो।       

Friday, May 12, 2017

ट्रैन


निश्चित नहीं है होना 
होने का अर्थ ही है - एक दिन नहीं होना 
लेकिन तुम बाज़ नहीं आते
अपनी जीने की आदत से 

शताब्दियों से इच्छा रही है तुम्हारी
यहाँ बस जाने की
यहीं इसी जगह 
इस टेम्परेरी कम्पार्टमेंट में 

तुम डिब्बों में घर बसाते हो
मुझे घर भी परमानेंट नहीं लगते

रोटी, दाल, चावल
चटनी, अचार, पापड़
इन सब पर भरोसा है तुम्हे

मैं अपनी भूख के सहारे जिंदा हूँ

देह में कीड़े नहीं पड़ेंगे
नमक पर इतना यकीन ठीक नहीं

तुम्हारे पास शहर पहुंचने की गारंटी है
मैं अगले स्टेशन के लिए भी ना-उम्मीद हूँ

तुम अपने ऊपर
सनातन लादकर चल रहे हो
दहेज़ में मिला चांदी का गिलास
छोटी बाईसा का बाजूबंद
और होकम के कमर का कंदोरा
ये सब एसेट हैं तुम्हारी 
मैं गमछे का बोझ सह नहीं पा रहा हूँ

ट्रैन की खिड़की से बाहर
सारी स्मृतियां 
अंधेरे के उस पार
खेतों में जलती हैं 
फसलों की तरह

मुझे जूतों के चोरी होने का डर नहीं लगता
इसलिए नंगे पैर हो जाना चाहता हूँ

सुनो, 
एक बीज मंत्र है
सब के लिए
हम शिव को ढूंढने
नहीं जाएंगे कहीं

आत्मा को बुहारकर
पतंग बनाई जा सकती है
या कोई परिंदा

हालांकि टिकट तुम्हारी जेब में है
फिर भी एस-वन की 11 नम्बर सीट तुम्हारी नहीं
इसलिए तुम किसी भी 
अँधेरे या अंजान प्लेटफॉर्म पर उतर सकते हो

नींद एक धोखेबाज सुख है
तुम्हारी दूरी मुझे जगा देती है

समुद्री सतह से एक हज़ार मीटर ऊपर
इस अँधेरे में
मेरा हासिल यही है
जिस वक़्त इस अंधेर सुरंग से ट्रैन
गुजर रही है
ठीक उसी वक़्त
वहां समंदर के किनारे
तुम्हारे बाल हवा में उलझ रहे होंगे
तुम्हारे हाथों पर 
खारे पानी की परतें जम गई होगी
कुछ नमक
कुछ रेत के साथ 
तुम चांदीपुर से लौट आई होगी। 

Tuesday, April 25, 2017

आंखें उसकी


उदासी में भींजे हुए फाहे
कोई रख जाए सिरहाने तुम्हारे
तुम देखना आँखें उसकी

जब दीवारों पर ओझल होने लगे
उसके पीठ के निशान कहीं 
तुम देखना आँखें उसकी 

और शाम का आखिरी अंधेरा 
उसकी शक्ल में डूबने लगे जब
तुम देखना आँखें उसकी

गर्मी की इन बोझिल दोपहरों से
जब तुम्हारा साथ छूट जाए
जब कोई किताब भी तुम्हारी टेबल पर न हों
तुम देखना
उसकी उंगलियों के बीच जो जगह है
वो तुम्हारे लिए है

दुनिया जब तुम्हे खींचकर 
कुफ़्र की ओर ले जाए
तुम देखना 
पूरब में उसका घर है

गर्मियों के आखिरी दिनों में
बारिशों से कुछ दिन पहले
जब तुम्हारी आँखों में
ठहर जाए बहुत सारा समंदर
जब बादलों का खाली हाथ लौटना रह जाए
तुम देखना आँखे उसकी

जब पैर रखने के लिए 
कुछ बचा न हो पृथ्वी पर 

तुम याद रखना

तुम्हें लिखने के लिए हमेशा जगह देती रहेगी

तुम बस देखना,
आंखें उसकी।



Thursday, December 22, 2016

उसकी चुप्पी

उसकी चुप्पी से खुलते हैं शहर
गहरी खाई से ऊबकर आते हैं सवेरे 

उजली हंसी में उगता है दिन 

उसकी उंगलियां रफ़ मसौदा लिखती हैं
संवलाई हाथ बातें करते हैं 

मोत्ज़ार्ट की धुन पर
ऊंघती हैं उदास दोपहरें 

दिन अपनी धूप को सरकाता हैं
धीमे धीमे शाम की तरफ 

रात तब्दील हो जाती है
अपने मिज़ाज़ में 

सख़्त नींदें झुकती नहीं
फिर भी बिस्तरों की तरफ 

वो कोई हैरत सुनना चाहती है
मुझे आसान नींद पसंद नहीं

पवनचक्कियां बहती हैं
पहाड़ों पर जहां
वहीं, उसकी आंख के एक छोर पर हूं मैं 

वो अपने होठों पर नमी चाहती हैं
मैं उसके माथे का तिल देखता हूं बार बार।

Sunday, October 23, 2016

मुकुल शिवपुत्र : हाल मुकाम कहीं नहीं।

ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घण्टों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत ढूंढा। जुगत लगाई कि भजन खत्म होते ही पीछे के रास्ते से जाकर पकड़ लूंगा, लेकिन ग्रीन रूम के दरवाजे से निकलकर पता नहीं कब और कहाँ अदृश्य हो जाते थे। अक्सर यही हुआ। भजन गाकर निकलते ही या तो लोगों ने घेर लिया या अचानक से कहीं गायब हो जाते।
कई महीनों बाद एक दिन पता चला कि होशंगाबाद में रेलवे स्टेशन के आसपास घूमते नज़र आए हैं। सफ़ेद मैली धोती- कुर्ता पहने और गमछा डाले। निर्गुण पंडित कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र। अधपकी दाढ़ी। तानपुरा कहीं दूर रखा है, जो बेहोशी में भी उनकी नज़र के घेरे में है। कोई कहता बीमार हो गए हैं- किसी ने कहा लड़खड़ा रहे हैं। पैर पर नहीं खड़े हो पा रहे हैं। मन हुआ कि चले जाऊं, लेकिन हिम्मत नहीं हो सकी- यह तय था कि जब तक इंदौर से होशंगाबाद पहुचेंगे, वे अदृश्य हो चुके होंगे। मामला उस दिन वहीँ दफा कर दिया। अच्छा भी हुआ- नहीं गए, अगर जाते तो संगत तो दूर रियाज़ भी कानों में नहीं पड़ता। अगले दिन खबर में थे कि भोपाल वालों ने उन्हें उठा लिया है। भोपाल में ख़याल केंद्र खोलेंगे और वहीँ रखेंगे। यह भी सिर्फ एक ख़याल ही रह गया।
फिर किसी दिन पता चला कि नेमावर में है नर्मदा किनारे। किसी बाबा की कुटिया में धुनि रमा रहे हैं। वहीं डेरा जमाया है। रात के अँधेरे में गौशाला के बाजू में बैठेते हैं। वहीं अँधेरे में भांग घिसते- घोटते हैं और कभी- कभार मन होता है तो गा भी लेते हैं। घाट से सटी उस कुटिया से तानपुरे और आलाप की हल्की खरज नर्मदा किनारों से टकराती है। किनारों के साम- सूम अंधेरे और नदी का संवलाई उजारा पंडित जी के उस रियाज का अभी भी गवाह होगा। शायद उस समय उन्होंने कुछ देर के लिए ही सही, नर्मदा किनारे अपना गाम बसाया हो।
फिर एक दिन भनक लगी कि हमारे पिंड इंदौर में ही हैं। एक अखाड़े में रह रहे हैं। उस दिन भी खूब ढूंढ़ा। पता लगाया कि कौनसा अखाड़ा है। किस मोहल्ले में हैं, किस उस्ताद को अपना चेला बना रहे हैं। कुछ नाम सुनने में आए- कल्लन गुरु व्यायामशाला। सुदामा कुटी व्यायामशाला या बृजलाल उस्ताद व्यायामशाला। इनमे से वे कहीं नहीं थे। दो- तीन दिन बाद पुख्ता सबूत मिले कि बड़ा गणपति के आगे पंचकुईया आश्रम में हैं। यहीं दाल बाटी खा रहे हैं। हनुमानजी के मंदिर के सामने। पंचकुईया अपने घर से दूर नहीं था। करीब पांच- छह किलोमीटर की दूरी पर बस। गाड़ी उठाकर निकल गए। बगैर देर किए चप्पल पहनकर। शाम का धुंधलका छा गया था। इंदौर का धुआं और धूल आदमी को फ़क़ीर बना देती है। घर से चप्पल पहनकर निकल जाओ तो खैरात में मिलने वाली इंदौर की धुंध-धूल से आदमी खुद को आधा कबीर महसूस करने लगता है। शाम साढ़े सात बजे पंचकुईया पहुँचे तो आरती की ध्वनि थी। घी के फाहों में भींजे दीयों में आग महक रही थी। सफ़ेद और भगवा धोती में अध् भींजे पुजारी स्तुति गान में थे। संध्या आरती और हनुमान चालीसा के पाठ की करतल ध्वनियां। अपना मन नहीं था लेकिन स्तुति में। फिर भी आरती खत्म होने तक इंतज़ार करना पड़ा। बीच- बीच में यहां- वहां देखते रहे। ताली बजाते हुए इधर- उधर नज़र फेरते रहे। किसी कुटी में कहीं नज़र आ जाए शिवपुत्र। कहीं से रियाज की या किसी आलाप की आवाज आ जाए। लेकिन सूना ही नज़र आया आश्रम। आरती खत्म होते ही पूछा किसी से- जवाब मिला जानकी महाराज से पूछ लो, उनको पता होगा। जानकी महाराज को ढूंढा तो वो अपने गमछे धो रहे थे। गमछों से उनके पानी झारने और सुखाने तक उनका इंतज़ार किया। फटका मारकर अपने कमरे से बाहर आए तो उनसे पूछा- पंडितजी कहाँ बैठे हैं। उन्होंने बताया कलाकार आए तो थे, लेकिन दोपहर में चले गए। दिल बैठ गया। हमने तस्दीक करने के लिए फिर पूछा- आप जानते हैं ना मैं किनके बारे में पूछ रहा हूँ - जवाब था, हां ! महाराज, शिवपुत्र आए थे, लेकिन चले गए। एक गाड़ी आई थी बैठकर चले गए। दो दिन यहीं भांग खाई, भजन गाये और आटा भी गूंथा। मैं समझ गया कि पंडितजी चले गए यहाँ से भी। थोड़ी- थोड़ी बदरंगी और बेरुखी के साथ लौट आए।
यह पंडितजी की ठुमरी और उनकी ख्याल गायकी से दीगर उनकी कबीरियत की संगत और उसे जानने के करतब थे, जो कभी कामयाब नहीं हुए। मौसिकी से परे उनकी बेफिक्री से हर किसी का राब्ता रहा है। मेरा कुछ ज़्यादा ही। बीच में एक सुर का अदृश्य तार तो जुड़ा ही रहा हमेशा, लेकिन संगत अब तक नहीं हो पाई। रियाज और आलाप तो बहुत दूर है। इसी बीच मुम्बई से कुछ फिल्म मेकर भी आये थे- वो पंडितजी पर डॉक्युमेंट्री बनाना चाह रहे थे। इस बहाने भी हमने उनको खूब खोजा-पूछा। देवास टेकरी पर 'माताजी के रास्ते' पर भी पूछा-ताछा। उनकी खोज में मुंबई वालों की मदद करने का मन कम और अपनी मुराद पूरी करने का इरादा ज्यादा था- इसलिए नेमावर से लेकर दिल्ली तक फोन लगाए, भोपाल भी पूछा, लेकिन कुछ नहीं हो सका।
फिलहाल मैं नागपुर में हूँ- उनका सुना है कि वे पुणे में हैं, लेकिन हमें अपने प्रारब्ध पर यकीन कुछ कम ही है - इसलिए वहां पुणे भी नहीं जा रहे। क्या पता वहां से भी भांग दबाकर कहीं रफूचक्कर हो जाए पंडित जी।
- मुकुल शिवपुत्र हाल मुकाम कहीं नहीं।

Wednesday, October 12, 2016

उंगलियां

उसकी आखों के जीने से
भीगकर
उतरकर आया
अमावस्य का पूरा दिन

दृश्य- अदृश्य
छाया और रौशनी
नदी के ठंडे किनारे
उँगलियों के पोर उसके
बर्फ की परतों से हाथ

पूरी हथेलियों का होना हथेलियों में
पूरी उँगलियों का होना उँगलियों में
उलझना, खुलना,
खुलते जाना

फिर जीना उनका
हमने
हम दोनों ने
एक घर बनाया
धागे बुने
हाथ जोड़े
प्रार्थनाएं की
गोल- गोल घेरे बनाए
अंगूठियों की तरह घूमी पृथ्वी
उसके मन के फेरे लगाए
उँगलियों में उलझकर
सुलझ गई नियति
उसके कंधों पर थमी
तो आसान हो गई जिंदगी।

अक्टूबर 12, 2015

Sunday, September 25, 2016

सितंबर

सारी लड़कियां सितंबर में पैदा नहीं होती 
इसलिए उनके पास स्कार्फ़ नहीं होता 

बालों में भीनी- गहरी ख़ुश्बू भी नहीं
आंखों में खार
दिल में ख़्याल
बे- ख़्याल ऐसा नहीं होता 

जहां सड़कें और पहियें रोज मिले
रोज जियें, रोज मरे 
यात्राओं के बगैर रहने वाले
एबॉन्डन रेलवे स्टेशनों की तरह 
उन लड़कियों के शहर
ऐसे नहीं होते 
दुनिया के आखिरी शहरों की तरह 

दरगाह का इत्र महके जहां
दोपहरें और शामें
कभी इतनी सख़्त
कभी इतनी नर्म नही होती 

अब रातों में कहाँ उतनी रातें
अंधेरों के पास नहीं अंधेरा घना

मैंने अपने हाथ में कभी इतनी अर्जियां नहीं रखीं
और पैरों में लम्बे इंतज़ार नहीं पाले 

मैं अकेले में इतना मुस्कुराया नहीं
इतना रोया भी नहीं कभी 

सारी लड़कियां सितंबर में पैदा नहीं होती
इसलिए उनके पास स्कार्फ़ नहीं होता 

बालों में भीनी- गहरी ख़ुश्बू भी नहीं 
आंखों में खार
दिल में ख़्याल
बे- ख़्याल ऐसा नहीं होता 

उनके पास एक गली
कुछ सड़कें और कुछ इमारतें नहीं होती 

सारी लड़कियों के पास
मीठा नीम शरीफ़ की पत्तियां नहीं होती 

फिर एक दिन उसने
मेरे हाथ पर एक शहर का नाम कुरेद दिया
तब से मेरे पास दो शहर हैं
और दो ख़्याल भी
एक उसका
और दूसरा भी उसी का 

बहुत सालों बाद
जब हम
हम मतलब 'हम दोनों'
मर जाएंगे 
जब उम्र तुम्हारी कमर पर झुकने लगेगी
तब सितंबर की ऐसी ही किसी रात में
मैं बारिश से तुम्हारी उम्र पूछूंगा 
और इन सभी बीते सालों से
पूछूंगा मेरी आह का असर 

तब आख़िरी सांस के पहले
एक हिचकी लूंगा
फिर तुम्हारा नाम

इस तरफ सरकती
धीमी और ठंडी मौत से पहले
कोशिश करूंगा जानने की 
प्यार मैं कौन था
मैं या तुम.

Sunday, September 18, 2016

जहाँ रुदन था अंतिम

फिर भी तुम नहीं लिख सके
नहीं पहुँच सके वहां
जहां गर्दन पर
नली के ठीक ऊपर
सांस के आरोह-अवरोह के बीच
तेज़ और चमकदार धार रखी है
धूप की तरह उजली
और गर्म
उस वक़्त कहीं नहीं होती हैं आँखेँ
बैगेर लड़खड़ाए
कुछ ही क्षण में
रक्त अख्तियार कर लेता है खंजर
पृथ्वी ने भी देखा
वह दृश्य लाल अपनी छाती पर
फिर भी तुम नहीं लिख सके
नहीं पहुँच सके वहां
जहाँ रुदन था अंतिम

Monday, July 25, 2016

मैं अब वहीं हूँ

मैं अब वहीं हूँ
उसकी आँख के एक छोर पर

पहाड़ों पर फिरकती
पवनचक्कियों में

चलती हुई
लेकिन कहीं नहीं पहुँचती हुई

उसके होंठ के किनारों में हूँ
सूखते नहीं, जो भीगते भी नहीं

मैं वहां नहीं हूँ, यहाँ भी नहीं
कहीं भी नहीं

अपनी आत्मा की तरह
जिंदा भी नहीं, मृत भी नहीं

बगैर दीवारों के मकान
जिनके दरवाजें नहीं, दस्तकें भी नहीं

उन रास्तों में हूँ
चलते नहीं, जो ठहरते भी नहीं

सड़क के पीले और सफ़ेद लेम्पोस्ट की तरह
जिनकी रोशनियों से कुछ छटता नहीं

पतंगे छटपटा कर मर जाते हैं जहाँ
ऐसे चौराहों को हासिल जहाँ कुछ भी नहीं

मैं वहीं कटूंगा धीरे- धीरे
जहाँ छोड़ा था तुमने
जिसे तुम पहला या अंतिम सिरा कहती थी
वहीं अपने घावों को देखूंगा
सुख में बदल जाने तक

मुझे मनाने की कोशिश मत करना
मैं सीख गया हूँ अब
नहीं लिखना - कुछ भी नहीं लिखना

अब मैं सिर्फ देखूंगा
अपना जीना, अपना मरना।

Saturday, July 16, 2016

वहीं,


वहीं,
मौत सी उसी ठंडी खामोश नींद में
मिलना मुझसे

या फिर नर्क में।
तुम जिंदगी से निहारना
और मैं अपनी मौत से झाकूंगा तुम्हे 

वहीं 
मौत सी उसी ठंडी ख़ामोश नींद में 
मिलना मुझे

या फिर कोई जगह तय कर बता देना
जहां तुम रहती ना हो 
या जहां मैं पहुंच न सकूँ 

Monday, June 20, 2016

सेमिनरी हिल्स

धरमपेठ के अपने सौदें हैं
भीड़ के सर पर खड़ी रहती है सीताबर्डी

कहीं अदृश्य है
रामदास की पेठ

बगैर आवाज के रेंगता है
शहीद गोवारी पुल
अपनी ही चालबाजियों में
ज़ब्त हैं इसकी सड़कें

धूप अपनी जगह छोड़कर
अंधेरों में घिर जाती हैं

घरों से चिपकी हैं उदास खिड़कियां
यहां छतों पर कोई नहीं आता

खाली आंखों से
खुद को घूरता है शहर

उमस से चिपचिपाए
चोरी के चुंबन
अंबाझरी के हिस्से हैं

यहां कोई मरता नहीं
डूबकर प्यार में

दीवारों से सटकर खड़े साये
खरोंच कर सिमेट्री पर नाम लिख देते हैं

जैस्मिन विल बी योर्स
ऑलवेज ..
एंड फॉरएवर ...

दफ़न मुर्दे मुस्कुरा देते हैं
मन ही मन

खिल रहा वो दृश्य था
जो मिट रहा वो शरीर

अंधेरा घुल जाता है बाग़ में
और हवा दुपट्टों के खिलाफ बहती है

एक गंध सी फ़ैल जाती हैं
लड़कियों के जिस्म से सस्ते डिओज की

इस शहर का सारा प्रेम
सरक जाता है सेमिनरी हिल्स की तरफ।

Saturday, June 18, 2016

कभी यूं भी तो हो


कभी यूं भी तो हो 

चलने की आहटें जहां 
वहीँ तुम्हारी आंख के किनारों पर शाम
उंगलियों के पोर में दोपहरें हो

रात गुजरे महक कर
सुबह शीशे की परी हो

रोज सुबह काजल से
खींचों किनारों पर मुझे
रात उतारो आंखों से लेंस की तरह

उस आधे अंधेरे वाली हथेलियों
उड़ते स्कार्फ़ की तरह जिंदगी हो

इन सारे अंधेरे कमरों में
तुम्हारे उजाले गश्त करें

पत्ते टूटे पेड़ से
उम्र टूटकर यूं झरे।


Sunday, February 14, 2016

ज़्यादातर दोष आँखों का है

ज़्यादातर दोष आँखों का है
घूम-फिर कर
सारी दुनिया वहीँ लौटती है।
आँख किनारे
तुम्हारे आईलाइनर की हद पर
हलकी नमी में
काजल घुलकर तिर जाता है जहाँ
वहीँ घट और घाट है।
गहरे, काले- कत्थई
डार्क सर्कल में
जहाँ पूरे साल के रतजगे जमा हैं
वहां भी एक दुनिया मौजूद है।
तन की ख़ुश्बू
और मांसल आकांक्षा से परे
प्रेम की अज्ञात खोह में भी
एक दुनिया रवां है।
तुम्हारी दोनों हथेलियों को जोड़ने पर
त्रिभुज के बाजू में
जो बीज बनती है
वहां भी दुनिया संभव है।
गोयाकि कुछ नुक्स
उस पहली कविता के हैं
और तुम्हारे हेयर ड्रायर के भी
जो तुम्हारे बालों की हिदायत नहीं सुनते
इसलिए मेरे कंधों पर उलझते रहे हर शाम।
मैं डूबने के लिए
मरने के लिए
तुम्हारी आँखों के किनारे चुनता हूँ।
आँख किनारे
तुम्हारे आईलाइनर की हद पर
हलकी नमी में
काजल घुलकर तिर जाता है जहाँ
वहीँ घट और घाट है।

Saturday, October 3, 2015

आँगना तो पर्बत भयो, देहरी भयी बिदेस

... हर शाम को ठुमरी की, धीरे- धीरे, टूटी हुई धुन बहती है. बाबुल मोरा नैहरवा छूटा ही जाए. हर शाम को एक जर्जर आवाज में इस ठुमरी के टूटे लफ्ज कान में आ गिरते थे ... जैसे कोई गुनगुनाते- गुनगुनाते हुए अपना सामान समेट रहा हो। जैसे कहीं जाने के लिए कोई सूटकेस में अपने कपड़ें जमा रहा हो, जाने की तैयारी कर रहा हो। फिर एक दिन तीसरी मंज़िल के उस कमरे का वह कौना खाली हो जाता है. कुर्सी खाली हो जाती है, दरअसल जगह सूनी हो जाती है। जिस जगह से शंकरगढ़ के पहाड़ नजर आते थे, जहां से पहाड़ पर खड़ी पवनचक्कियां हवा के साथ बहती थीं, और हम कई बार खाली दोपहरों में पवनचक्कियों और पहाड़ों की बातें किया करते थे। हम सब की आँखें खिड़कियों से बाहर अक्सर उतनी ही दूर होती थी। खिड़कियां दिन ब दिन माफियाओं की कुल्हाड़ी से कटकर और घटकर छोटे होते पहाड़ों को देखती थीं, उनके साथ बातें किया करती थीं। उन खिड़कियों से शहर का वो सालों पुराना बड़ा स्तंभ भी नजर आता था। जिसका दरवाजा कभी बंद नहीं होता। पूरे शहर के लोग उस दरवाजे के आर-पार जा सकते थे. सड़क से गुजरते दूसरे शहरों के लोग उसकी ऊंचाई नापते रहते थे, उसकी उम्र की टोह लेते थे। उस दरवाजे से पूरे शहर के लोग आना-जाना
करते थे। जाते थे, फिर वापस आ जाते थे, लेकिन रविंद्रजी उस दरवाजे से नहीं गए। वो एक ऐसे दरवाजे में दाखिल हो गए जो अंदर से, उस तरफ से बंद हो जाता है। वे अब पूरे शहर के लोगों की तरह आना-जाना नहीं कर सकते। कोई उन्हें आते-जाते नहीं देख सकता। पता नहीं कौनसी अज्ञात, अनंत यात्रा, कौनसा ठोर है, गोल घूमकर वापस आते हैं या सीधे निकल जाते हैं। वे एक दिन अचंभित कर के चले गए. जैसे हर बार, कई बार मैं उनकी जानकारियों और चिंतन से अचंभित होता रहा। उन्होंने ही बताया था, " बाबूल मोरा नैहरवा छूटा ही जाए "  लखनऊ के दसवें और आखिरी नवाब वाजिद अली शाह ने लिखा था। यह भी उनसे ही सुना था कि किस तरह म्यूजिक, डांस और आर्किटेक्चर के लिए वो आखिरी बादशाह हमेशा अपना सर धुनता रहा. उन्होंने बताया कि किस तरह वाजिद अली ने एक परीखाना बनाया, जहां सैकड़ों खूबसूरत लड़कियां डांस और म्यूजिक सीखती थीं. बहुत खूबसूरती और ग्रेसफुली रविंद्रजी बताते थे कि इन लड़कियों को फेयरी यानि परी कहा जाता था। उन्होंने ही बताया था कि लखनऊ से अपने निर्वासन काल के दौरान इस बादशाह ने यह भेरवी ठुमरी बाबूल मोरा नैहरवा लिखी थी। अब तक यह ठुमरी मैने सिर्फ पं. भीमसेन जोशी की आवाज में सुनी थी। बाद में पता चला स्ट्रीट सिंगर फिल्म में कुंदनलाल सहगल ने भी गाई थी, इसके बाद कई और शास्त्रीय मूर्धन्य गायकों ने इसे गाया। वे कई बार शाम को या रात को आॅफिस के बाद अपनी लड़खड़ाती आवाज में राजनीति, धर्म-कर्म, देश, सिस्टम और राजनीति के बड़े लोगों के बारे में अचंभित करने वाले किस्से भी सुनाते थे। किसी शाम संजय गांधी, तो कभी उनके प्रिय चंद्रशेखर ( आज़ाद नहीं ) कुछ किस्सों का जिक्र यहाँ मुफीद नही। वो अपने भीतर शहर भी इकट्ठा करते रहे। उन्होंने अपने अंदर से अपने बलिया, पटना और कलकत्ता को मरने नहीं दिया- इंदौर को वो अपने भीतर लेकर चले। वो अपने पिता के लिए आठ साल की उम्र के बाद बड़े नहीं हुए। जब वो खुद गए तो उनका बेटा भी आठ साल का ही था। मैं फिर अचंभित हूँ, उनके लिए जैसे कोई फिक्स सेड्यूल हो।
नईदुनिया के आॅफिस से बाहर की तरफ पहाड़ों को ताकती उन खिड़कियों के पास तकरीबन हर शाम को रविंद्रजी की जर्जर आवाज में यह ठुमरी एक सिलसिला हो गई थी। हो सकता है इंदौर में वेंटिलेटर पर भी उन्होंने गुनगुनाने की कोशिश की हो। 13 मई 2015 को यह सिलसिला टूट गया। इसी दिन नईदुनिया से मेरी भी रवानगी हो गई। हलक में कुछ अटका सा रह गया। जो अब तक हैं, अटका हुआ। ऐसा लगता है कुछ पूरा होना चाहिए था। पूरा नहीं तो थोडा- बहुत इसके आसपास ही सही। सुबह पाँच बजे नागपुर के एमएलए होस्टल में अकेले रोने का सुख भी आपके कारण भोगा। मुझे ख़ुशी हुई की मैं इस उम्र में भी रो सकता हूँ। उनके आॅफिस में बैठने की कुर्सी और जगह मेरे जहन में है। उन्होंने मुझे खुद को मरा हुआ देखने का मौका भी नहीं दिया। वाजिद अली शाह ने यह ठुमरी लखनऊ से अपने निर्वासन के दौरान लिखी थी और रविंद्रजी इसे अपने निर्वासन के कुछ दिन पूर्व तक गाते- गुनगुनाते रहे। अब, इसके बाद मैं इस ठुमरी को नहीं सुनता हूँ, कभी सुनूंगा तो एक एलजी (शोकगीत) के तौर पर। उनके ठुमरी गाने और उनके चले जाने की टाइमिंग भी मुझे अचंभित कर गई. जैसे गुनगुनाते- गुनगुनाते उन्होंने अपनी तैयारी कर ली हो। हालांकि, एक पुरज़ोर दावे के साथ मैं यह जानता हूँ कि वो मरने के लिए तैयार नहीं थे। एक चिट्ठी में उन्होंने अपने नहीं मरने के लिए प्रार्थना भी की थी, इसलिए नहीं कि वो मौत से डरते थे, इसलिए की उनकी मौत के बाद की जिंदगियां कहाँ और कैसी होगी, वो क्या भोगेगी, लेकिन, शंकरगढ़ के पहाड़ों की तरह उनकी उम्र भी कट गई, घट गई. देह और आत्मा दोनों से स्वस्थ्य आदमी के दिल ने धोखा दे दिया या डॉक्टरों ने यह आज तक समझ नहीं आता। हम हफ्तेभर में दो-तीन बार शराब पीते थे, इस दौरान ऐसा लगता था कि मैं अपने किसी पुरखे के साथ शराब पी रहा हूं। वो मुझे मटन और फिश खिलाने के लिए अपने घर ले जाते थे। मैं उनका आग्रह टालने के लिए उनसे कहता था कि अब मेरी मांस खाने की इच्छा मरती जा रही है। वो कहते थे मांस खाना मत छोड़ना। एक मनुष्य के चरित्र में तामसिक प्रवृतियां होना भी जरुरी है, यह भी वो खुद अपने भीतर सात्विक प्रवृति भी लेकर चलते थे। कभी पूछते थे कि मेरे बच्चों ने कभी पिज्जा नहीं खाया, बताओ कौनसा पिज्जा खिलाऊं, कभी कहते मकान किराये का है यार, लेकिन क्या करना है बस …  बेटा कमाने- खाने के काबिल हो जाए। कभी कहते थे बीमे की राशि मिलती तो है न। साली कंपनियां धोखा तो नहीं दे देगी। लगता था, जैसे वे खुद ही सवाल कर रहे हैं और खुद को ही जवाब दे रहे हैं। आज आपके जन्मदिन पर आपकी मौत के बारे में बात करना ठीक नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि मौत और जीवन इन दोनों के बीच के स्पेस के दो किनारे हैं। अब आप उस किनारे पर हैं, और मैं इस किनारे पर। मैं आपके मरने के बाद अब तक आपके जिंदा नहीं होने का कारण और जवाब ढूंढ रहा हूं। मेरे ग्लास से अपना ग्लास टकराकर आवाज ही सुना दो तो यक़ीन आए कि आप सब देख रहे हो, सुन रहे हो और यहीं कहीं हो, इसी किनारे।

बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
चार कहार मिल, मोरी डोलिया सजावें (उठायें)
मोरा अपना बेगाना छूटो जाए
बाबुल मोरा ...
आँगना तो पर्बत भयो और देहरी भयी बिदेश
जाए बाबुल घर आपनो मैं चली पीया के देश
बाबुल मोरा ..